40 लाख साल वृक्षों में से लगभग 60 हजार पेड़ साल बोरर का संक्रमण

राजेश शुक्ला, अनूपपुर
। मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा के उद्गम स्थल एवं अनूपपुर जिले के अमरकंटक के घने जंगलों में साल बोरर नामक कीट का प्रकोप बढ़ रहा है। इससे साल के लाखों पेड़ों पर संकट मंडरा रहा है। वन विभाग के अनुसार, अमरकंटक के 8,584 हेक्टेयर वन क्षेत्र में फैले करीब 40 लाख साल वृक्षों में से लगभग 60 हजार पेड़ संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं। इनमें 9,535 संक्रमित पेड़ों की कटाई को केंद्र सरकार से मंजूरी मिली है। वन विभाग ने कपिलधारा, सोनमुड़ा और अमरकंटक बीट में कटाई शुरू कर दी है। इन तीन स्थानों पर अब तक करीब 400 पेड़ काटे जा चुके हैं।

जनवरी तक पूरा करने का लक्ष्य
बारिश के कारण रुका काम 15 अक्टूबर से शुरू किया है। विभाग का लक्ष्य जनवरी के अंत तक स्वीकृत पेड़ों की कटाई पूरी करना है। काटे गए पेड़ों की छिलाई और छोटे आकार में कटिंग कराई जा रही है। इसके बाद लकड़ियों को वन डिपो भेजा जाएगा। अमरकंटक साल वृक्षों का संवेदनशील क्षेत्र है। यहां कटाई के बाद संक्रमित लकड़ियों का भंडारण करने से कीटों के दूसरे पेड़ों तक फैलने का खतरा बना रह सकता है। इसी वजह से वन विभाग ने अमरकंटक और आसपास के क्षेत्रों में डिपो बनाने के बजाय शहडोल जिले के नरसरा वन डिपो में लकड़ियों के भंडारण का निर्णय लिया है।

संक्रमण अभी शुरुआती चरण में 
वन विभाग ने संक्रमण और पेड़ों की स्थिति के आधार पर उन्हें टी-1 से टी-6 श्रेणियों में वर्गीकृत किया है। अधिकारियों के अनुसार, दूसरे पेड़ों में संक्रमण अभी शुरुआती चरण में है। ऐसे में समय रहते नियंत्रण के प्रयास किए जा रहे हैं। 18 अक्टूबर को जबलपुर स्थित राज्य वन अनुसंधान संस्थान (एसएफआरआई) की टीम ने भी क्षेत्र का दौरा किया था। उसके मार्गदर्शन में कटाई का काम कराया जा रहा है।

कीट का जीवनकाल डेढ़ साल का 
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक के सहायक प्राध्यापक डॉ. शिवाजी चौधरी के अनुसार, साल बोरर का संक्रमण समय रहते नहीं रोका गया तो यह जंगल के लिए गंभीर संकट बन सकता है। एक मादा वयस्क कीट 250 से 300 अंडे देती है। इनसे तीन से सात दिन में लार्वा निकल आते हैं, जो कई महीनों तक पेड़ के तने के भीतर लकड़ी को नुकसान पहुंचाते रहते हैं। कीट दिसंबर से अप्रैल के बीच प्यूपा अवस्था में रहते हैं। इसके बाद अगले मानसून में वयस्क बनकर बाहर निकलते हैं और संक्रमण का नया चक्र शुरू हो जाता है। साल के पेड़ से निकलने वाला गोंद यानी राल भी इन कीटों को आकर्षित करता है। कीट तने के भीतर घुसकर लकड़ी को खोखला कर देते हैं। इससे पेड़ धीरे-धीरे सूखने लगता है।

1923-24 में भी तबाह हुए थे लाखों साल वृक्ष
डॉ. चौधरी के अनुसार, वर्ष 1923-24 में डिंडोरी क्षेत्र में साल बोरर के प्रकोप से करीब 70 लाख साल वृक्ष नष्ट हो गए थे। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि वर्ष 1995-96 में भी अमरकंटक क्षेत्र में इस कीट का बड़ा प्रकोप सामने आया था। उस समय शुरुआती स्तर पर संक्रमण पर नियंत्रण नहीं हो पाने से बड़ी संख्या में पेड़ प्रभावित हुए थे। संक्रमित पेड़ों को काटकर जंगल से हटाना पड़ा था। पुराने अनुभवों को देखते हुए इस बार संक्रमण को सीमित रखने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है। वन विभाग का जोर संक्रमित पेड़ों को हटाने के साथ कीटों को पकड़ने और उनके प्रसार की चेन तोड़ने पर है।

ट्रैप ट्री पद्धति से वयस्क कीट पकड़ने की तैयारी
वन विभाग की रणनीति है कि वयस्क कीटों को अंडे देने से पहले ही पकड़कर नष्ट किया जाए। इसके लिए ट्रैप ट्री पद्धति का इस्तेमाल किया जा रहा है। संक्रमण के शुरुआती चरण में नियंत्रण के प्रयासों को अहम माना जा रहा है, क्योंकि कीटों का जीवनचक्र आगे बढ़ने पर नए पेड़ों तक संक्रमण पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।

8,584 हेक्टेयर वन क्षेत्र के 17 कक्षों में फैला संकट
वन मंडलाधिकारी अनूपपुर डेविड चनाप ने मंगलवार को बताया कि अमरकंटक के 8,584 हेक्टेयर वन क्षेत्र के 17 कक्षों में करीब 40 लाख साल वृक्ष हैं। इनमें लगभग 60 हजार पेड़ संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं। संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए अमरकंटक में 9,535 और डिंडोरी में 1.46 लाख पेड़ों की कटाई को केंद्र सरकार से मंजूरी मिली है। उन्होंने बताया कि पहले वन विभाग की 16 समितियों के माध्यम से 40,200 साल बोरर कीटों को पकड़कर नष्ट किया गया था। अब संक्रमित पेड़ों को काटकर हटाया जा रहा है, ताकि कीटों का प्रसार रोका जा सके।