गोरखपुर और इर्द-गिर्द के कस्बे : जो ब्रिटिशकालीन अंग्रेज़ अधिकारियों और ज़मीनदारों के नाम पर बसे हैं

विवेकानंद सिंह
: ब्रिटिश आईसीएस, हेनरी राल्फ़ नेविल द्वारा संकलित एवं 1909 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से प्रकाशित, 'गोरखपुर : ए गजे़टियर' के अनुसार यूनाइटेड प्रोविंसेस आगरा एंड अवध (अब उत्तर प्रदेश) के उत्तर-पूर्वी कोने में नेपाल सीमा के निकट स्थित है ज़िला गोरखपुर, जिसका प्रशासनिक मुख्यालय है गोरखपुर। 

Towns Around Gorakhpur Named After British-Era Officers and Zamindars

जब उपरोक्त ज़िला का गठन हुआ, तब इसके अंतर्गत वर्तमान आज़मगढ़ (1832 में ज़िला बना), बस्ती (1865), देवरिया (1946), सिद्धार्थ नगर (1988), महाराजगंज (1989), कुशीनगर (1994) और संत कबीर नगर (1997) जनपदों के अलावा नेपाल के तराई में स्थित विनायकपुर एवं तिलपुर (जिसे 1816 में हुए सुगौली-संधि के बाद बरतानिया हुकूमत ने नेपाल को सौंप दिया) के तमाम क्षेत्र शामिल थे। 1829 में गोरखपुर को 'द सीडेड एंड कॉन्कर्ड प्रोविंसेस' (अब उत्तर प्रदेश) के अंतर्गत एक डिवीज़न बनाया गया, जिसमें गोरखपुर, ग़ाज़ीपुर और आज़मगढ़ का संपूर्ण क्षेत्र शामिल था। 1908 में प्रकाशित 'द इंपीरियल गज़ट ऑफ़ इंडिया' के अनुसार गोरखपुर शहर में नगरपालिका का गठन 1873 (04 दिसंबर, 1873) में हुआ था, तत्पश्चात् 1982-83 में इसे नगर निगम बना दिया गया।

हिजरी 1006 (लगभग 1597-98 ई.) में अबुल फ़ज़ल इब्न मुबारक द्वारा रचित, 'आइन-ए-अकबरी' के अनुसार मुग़ल बादशाह अकबर के शासनकाल में गोरखपुर, सूबा-ए-अवध के पाँच सरकारों, यानी अवध, लखनऊ, बहराइच, खैराबाद और गोरखपुर में से एक, गोरखपुर सरकार का मुख्यालय था, जिसके 24 महालों में कुल 244,283 बीघा और 13 बिस्वा उपजाऊ भूमि शामिल थी, जिसका कुल राजस्व था - 11,926,790 दाम और इस राजस्व की वसूली के लिए यहाँ 1,010 घुड़सवार सेना और 22,000 पैदल सेना की नियुक्ति की गई थी। 1732 में यह क्षेत्र, अवध (राजधानी फ़ैज़ाबाद) के प्रथम नवाब सआदत ख़ाँ बुरहान-उल-मुल्क के अधीन हो गया, लेकिन 10 नवंबर, 1801 को लखनऊ में अवध के नौवें नवाब वज़ीर, सआदत अली ख़ाँ द्वितीय ने अहमद शाह अब्दाली के पोते, पश्तून शासक, ज़मान शाह दुर्रानी के हमले के डर से कलकत्ता (अब कोलकाता) स्थित फोर्ट विलियम प्रेसिडेंसी के गवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेस्ली के साथ एक सब्सिडियरी एलायंस (सहायक संधि) की, जिसके तहत अवध को अपने ख़र्च पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की एक स्थायी सेना, जिसमें लगभग 10,000 सैनिक शामिल थे, रखनी पड़ी और अपने आधे से अधिक उपजाऊ भूमि को कंपनी के सुपुर्द करना पड़ा। जिसके अंतर्गत वर्तमान गोरखपुर (पहले इसका नाम मुअज़्ज़माबाद था) के साथ ही आसपास का क्षेत्र शामिल था। तत्पश्चात् इस क्षेत्र को बंगाल प्रेसीडेंसी के अंतर्गत नवनिर्मित प्रांत, यानी 'द सीडेड एंड कॉन्कर्ड प्रोविंसेस' (जिसमें अवध के नवाब द्वारा सौंपी गई भूमि और द्वितीय एंग्लो-मराठा युद्ध के बाद मराठों से छीने गए क्षेत्र सम्मिलित थे) में मिला दिया गया, जिसकी राजधानी आगरा थी। 

ज़िला गोरखपुर के प्रथम प्रभारी अधिकारी, यानी कलेक्टर - जॉन राउटलेज थे। एच. आर. नेविल ने लिखा है कि "शायद ही किसी अन्य अधिकारी को, जिन्होंने सबसे पहले सौंपे गए जिलों का प्रबंधन संभाला था, इतना कठिन कार्य करना पड़ा हो। राउटलेज इस क्षेत्र की दयनीय स्थिति को देखकर स्तब्ध रह गए; उनके पास एक भी विश्वसनीय अधीनस्थ अधिकारी नहीं था, कोई पुलिस नहीं थी और राजस्व का आकलन या संग्रह करने का कोई साधन नहीं था और उन्हें लगातार बर्ख़ास्त अधिकारियों और सैनिकों की उपस्थिति से परेशानी होती रही, जो अभी भी दुर्भाग्यशाली निवासियों को लूटने में व्यस्त थे।" 

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफे़सर, मिर्ज़ा सईद-उज़ ज़फ़र चगताई ने अपनी पुस्तक, 'मेमोरी ऑफ़ थ्री कॉन्टिनेंट्स' में उल्लेख किया है कि "लगातार प्रयासों के बाद ही राउटलेज ने इस क्षेत्र का प्रबंधन संभाला। उन्होंने अपने शिविरों को जंगली बाघों से बचाने के लिए हाथियों का घेरा बनाया और जंगली हाथियों को दूर रखने के लिए चारों ओर आग जलाई।"

1902 में लन्दन से प्रकाशित, यूनिवर्सिटी कॉलेज, लन्दन में भारतीय इतिहास के प्रवक्ता, रमेश दत्त की पुस्तक, 'द इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ़ ब्रिटिश इंडिया ए रिकॉर्ड ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड लैंड सेटलमेंट्स, ट्रेड एंड मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्रीज, फाइनेंस एंड एडमिनिस्ट्रेशन फॉर्म द राइस ऑफ़ द ब्रिटिश पॉवर इन 1757 टू द एक्सेशन ऑफ़ क्वीन विक्टोरिया इन 1837' में गोरखपुर के बारे में उल्लेख मिलता है कि "गोरखपुर उन ज़िलों में से एक था......जिसे 1801 में मार्क्विस ऑफ़ वेलेस्ली द्वारा किए गए समझौते के तहत कंपनी को सौंप दिया गया था।........लॉर्ड वेलेस्ली ने 1803 और 1805 में सौंपे गए और जीते गए प्रांतों में स्थायी बंदोबस्त करने का वादा किया था - एक ऐसा वादा जो कभी पूरा नहीं हुआ। सौंपे गए ज़िलों में से एक, गोरखपुर के बारे में डॉ. बुकानन का विवरण पढ़ना दिलचस्प है, जहाँ उन्होंने ज़िला सौंपे जाने के लगभग दस साल बाद दौरा किया था।"

"ऐसा कहा जाता है कि शुजा-उद-दौला के शासन के दौरान, यह ज़िला अभी की तुलना में कहीं बेहतर स्थिति में था, और कर्नल हैनी को लगान का ठेका दिए जाने के बाद, उस सज्जन ने वसूली में इतने हिंसक कदम उठाए कि देश की आबादी कम हो गई, और मैं निश्चित रूप से खेती के कई निशान देखता हूँ जहाँ अब बंजर ज़मीन और जंगल हैं।"

"जब देश अंग्रेजों को सौंपा गया, तो प्रबंधन के लिए नियुक्त मेजर राउटलेज ने बहुत जोश और समझदारी से काम किया। उन्होंने तुरंत, जब हमारी अनुशासन की जानी-मानी शक्ति ने उन्हें अधिकार दिया, हर किले को ध्वस्त कर दिया, और इस तरह कानून का बेरोक अधिकार स्थापित किया, जिसने निचले तबके के लोगों को पहले कभी न मिलने वाली सुरक्षा दी, और सभी तरफ से बसने वालों को आकर्षित किया। उनके दावे शुरू में बहुत मामूली थे, और मुख्य गलती यह थी कि बंदोबस्त बहुत कम समय के लिए किया गया था। . . .कुल मिलाकर मुझे कहना होगा कि इस ज़िले के मालिकों के साथ मेरे विचार से बहुत बुरा बर्ताव किया गया है। जहाँ भी देश पूरी तरह से बसा हुआ है, जैसा कि घाघरा के दाहिनी ओर है।"

1801से लेकर 1858 तक ईस्ट इंडिया कंपनी के और उसके बाद 1947 तक ब्रिटिश क्राउन के अंग्रेज़ अधिकारियों, ज़मींदारों, नील एवं गन्ना उत्पादक और व्यापारियों का गोरखपुर तथा आसपास के क्षेत्रों में आना-जाना लगा रहा। जिनमें से कई अंग्रेज़ और उनके परिजनों की क़ब्र आज भी पैडलेगंज स्थित क़ब्रिस्तान में मौजूद है। जहाँ प्रतिवर्ष क़ब्रिस्तान प्रबंधन की ओर से वर्ष में एक बार कैंडल जलाई जाती है।

इस संदर्भ में उल्लेखनीय बात यह है कि यद्यपि भारतवर्ष 15 अगस्त, 1947 को बरतानिया हुकूमत से मुक्त हो गया, बावजूद इसके आज भी गोरखपुर महानगर और उसके आसपास के क्षेत्रों में कई स्थान, कस्बे या गाँव ऐसे हैं, जो अंग्रेज़ अधिकारियों अथवा ज़मींदारों के नाम पर बसाए गए थे। 

तो आइए! पुराभिलेखों के अध्ययन और स्थानीय पत्रकारों एवं सामान्य नागरिकों की बातचीत से जानते हैं कि ये स्थान, कस्बे या गाँव कौन से हैं तथा इनका ऐतिहासिक संदर्भ क्या है?

रीड साहब का धर्मशाला - अहिरौलीनिवासी गजेंद्र बहादुर सिंह, पूर्व असिस्टेंट कमिश्नर, सेल्स टैक्स विभाग (अब कमर्शियल टैक्स डिपार्टमेंट) ने एक दूरभाषिक साक्षात्कार में बताया कि 1680 में औरंगज़ेब द्वारा नियुक्त, गोरखपुर के चकलादार, क़ाज़ी ख़लील-उर-रहमान ने वर्तमान गोरखपुर स्थित बेतियाहाता चौक के निकट मुग़ल सिपहसालारों के निवास के लिए एक फोर्ट का निर्माण कराया था, लेकिन 1839 में गोरखपुर के तत्कालीन कलक्टर, ई. ए. रीड ने 5880 रुपये में स्थानीय रइसों और व्यापारियों के आर्थिक सहयोग से उक्त फोर्ट को धर्मशाला में तब्दील करवा दिया। जिसे फ़रवरी, 2025 में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया, ताकि इसे विरासत के रूप में बचाया जा सके।

बर्डघाट - श्री सिंह ने आगे बताया कि गोरखपुर का बर्डघाट मोहल्ला, एक ब्रिटिश अधिकारी, रॉबर्ट मर्टिन्स बर्ड के नाम पर बसाया गया है, जो 1829 में गोरखपुर डिवीज़न के राजस्व और सर्किट आयुक्त के पद पर नियुक्त थे। इसके अलावा गोरखपुर के एक मोहल्ला साहूगंज का नाम बदलकर साहिबगंज कर दिया गया।

पीपीगंज - गोरखपुर के स्वतंत्र पत्रकार, सिद्धार्थ श्रीवास्तव ने बताया कि गोरखपुर के पीपीगंज का नाम एक ब्रिटिश इंजीनियर, विलियम क्लैक्सटन पेप्पे (विली) के नाम पर पेप्पेगंज रखा गया था, जो बाद में पीपीगंज हो गया। इस संदर्भ में पूछे जाने पर लन्दन स्थित रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के लाइब्रेरियन डॉ. एडवर्ड विच ने मेल द्वारा सूचित किया कि डब्ल्यू. सी. पेप्पे का जन्म 1852 में भारत में ही हुआ था। उनके पिता (विलियम पेप्पे) उत्तरी भारत में एक एस्टेट (बर्डपुर) के मैनेजर थे। डब्ल्यू. सी. पेप्पे ने एबरडीन में शिक्षा प्राप्त करने के बाद की 1873 में अपने पिता की सहायतार्थ भारत लौट आए और 1880 के दशक की शुरुआत में बर्डपुर के एस्टेट मैनेजर बन गए और 1897 की वसंत ऋतु में, पेप्पे ने बर्डपुर एस्टेट के पिपरहवा में खुदाई का काम शुरू करवाया, जिसमें लाल पकी हुई ईंटों का एक ठोस ढांचा मिला, दरअसल यह लगभग 130 फीट व्यास का एक विशाल गुंबदनुमा छत थी। पेप्पे ने प्राचीन भारतीय इतिहास और पुरातत्व के विशेषज्ञ, विन्सेंट स्मिथ से संपर्क किया, जिन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यह एक प्राचीन बौद्ध स्तूप है, जो संभवतः अशोक महान के युग का है।

बृजमनगंज - ज़िला महराजगंज के अंतर्गत बसा यह कस्बा, लेहड़ा एस्टेट के अंग्रेज़ अनुदानग्राही लैंडलॉर्ड, जॉन हॉल ब्रिजमैन के नाम पर बसा है, पहले इसे साहिबगंज के नाम से जाना जाता था। जे. एच. ब्रिजमैन की मृत्यु 1892 में हुई और फिर उनकी ज़मींदारी उनके पूर्व मैनेजर और दामाद, जे. जे. होल्ड्सवर्थ, सीआईई को मिली, इस एस्टेट की देखभाल एफ. हॉवर्ड करते थे। बृजमनगंज को 2020 में नगर पंचायत घोषित किया गया और यहाँ के रेलवे स्टेशन का नाम भी इसी नाम से है, जो 1890 में बना था। गोरखपुर के राप्ती नगर के रविकांत सिंह ने बताया कि इस कस्बा के पड़ाव, यानी रामलीला मैदान में विगत् 1885 से ही दशहरे के अवसर पर प्रतिवर्ष रामलीला के साथ ही मेला का आयोजन किया जाता है।

बर्डपुर - ज़िला सिद्धार्थनगर के नौगढ़ तहसील में पड़नेवाले बर्डपुर कस्बे का नामकरण अंग्रेज़ अधिकारी, आर. एन. बर्ड के नाम पर हुआ है, जो 1829 में गोरखपुर के कमिश्नर थे।1856 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध की सत्ता पर अधिकार कर लिया, उसके बहुत पहले ही तत्कालीन गोरखपुर में अंग्रेज़ों ने अपनी कई ज़मींदारियां स्थापित कर ली थीं, जिनमें बर्डपुर, नेउरा ग्रांट, दुल्हा कोठी, अलीदापुर व सरौली प्रमुख थी, जिसमें बर्डपुर एस्टेट की स्थापना 1832 में हुई थी और इसके ज़मींदार थे - जे. जे. मैकलाचलन। 

कैंपियरगंज - गोरखपुर जनपद के कैंपियरगंज कस्बे में जो रेलवे स्टेशन था, उसके स्टेशन मास्टर थे विलियम कैंपियर हार्गलस, जिनके नाम पर इस कस्बे का नाम कैंपियरगंज पड़ गया। 

वाल्टरगंज - बस्ती जनपद के वाल्टरगंज कस्बे का नाम नील की खेती करानेवाले ब्रिटिश मॉक वॉल्टियर के नाम पर पड़ा, जो लगभग 1867 में इस इलाके में आकर नील की खेती कराने लगे। कालांतर में स्थानीय लोगों के प्रयास से अब इसे श्रीपालपुर और गोविन्दनगर के नाम से जाना जाने लगा है। 

अब प्रश्न यह है कि क्या बरतानिया हुकूमत की याद दिलानेवाले इन स्थानों का नाम बदल देना चाहिए? इस संदर्भ में कई विद्वानों का मत है कि इन ब्रिटिशकालीन स्थानों का नाम भले ही बदल दिया जाए, लेकिन वहाँ के इतिहास को संरक्षित किया जाए और तत्कालीन भवनों को सुरक्षित रखा जाए, ताकि आनेवाली पीढ़ी अपने अतीत को भली-भाँति समझ सके और वह यह जान सके कि हमारे पूर्वजों ने भारत की स्वतंत्रता के लिए क्या-क्या यातनाएँ झेली हैं?
लेखक: विवेकानंद सिंह, प्रकाश कॉलोनी, बालेश्वर घाट मार्ग, बलिया 277001, उत्तर प्रदेश।
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