शेर प्रेम सद्भाव के अब मज़ा नहीं देते: मुक्तकलोक एकल काव्य पाठ में अरुण अर्णव खरे

मुक्तक लोक समूह द्वारा आयोजित ऑनलाइन एकल काव्यपाठ की श्रृंखला में आज मध्यप्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकार अरुण अर्णव खरे के एकल काव्यपाठ का आयोजन किया गया । उन्होंने काव्य की अनेक विधाओं, गीत, गीतिका, मुक्तक, दोहा, छंदमुक्त, बालगीत, नवगीत और क्षणिका के साथ ही विभिन्न रसों में अपना काव्यपाठ कर श्रोताओं को सम्मोहित कर दिया । 

उनकी गीतिकाओं के इन युग्मों को देखिए -  “बस्ती बस्ती आग लगा दी सियासतदारों ने / मैं तो बचा खिंचा सद्भाव बचाने निकला हूँ” और “बयार कुछ ऐसी बही, लगे हैं लोग कहने/शेर प्रेम सद्भाव के अब मज़ा नहीं देते” तथा “खुश रहने का हुनर कोई उनसे सीखे / बिना छप्पर के जिनके मकान होते है” 

काव्य पाठ के क्रम में उन्होंने कविता “हमारा और तुम्हारा प्रेम”, नवगीत “लजीली धूप शरद की”, गीत “मस्त बड़े थे कच्ची उम्र की कमियों वाले दिन” तथा बालगीत “ऑफिस ऑफ़िस बस पापा” पढकर वाहवाही लूटी । अंत में उन्होंने पढ़ा - “साँस साँस चंदन हुईं, अँखियाँ भी रतनार / चिट्ठी तेरे प्यार की, बॉंची पहली बार” तथा “उपवन, मौसम, चाँदनी, तुमसे मेरे छंद /तुमसे अधरों की हँसी, तुमसे सब आनंद”
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