मोहन के हाथ में बालाघाट की कमान, तेजी से बदल रही है तस्वीर

बालाघाट से लौटकर ललित मुद्गल:
बालाघाट की हालिया तस्वीरें सिर्फ स्वास्थ्य संकट की कहानी नहीं बतातीं। ये दिखाती हैं कि दशकों तक विकास से कटे रहने के कितने गंभीर परिणाम हो सकते हैं। मध्य प्रदेश के पूर्व नक्सल प्रभावित बालाघाट जिले के बैगा और गोंड बहुल गांवों में हाल के महीनों में 25 से अधिक बच्चों की मौत हुई है। खसरा, मलेरिया, कुपोषण और अन्य बीमारियों का प्रकोप फैला। इस स्थिति को सरकार की पहली सफलता कहा जाएगा क्योंकि यह वही इलाका है जहां 36 साल तक स्वास्थ्यकर्मियों की पहुंच ही नहीं थी। किसी को नहीं पता इन 36 सालों में कितने बच्चों का क्या हुआ।

नक्सल मुक्त बालाघाट की तस्वीर बदल रही है

अब स्थिति बदल रही है। मध्य प्रदेश सरकार, छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र सरकार के संयुक्त प्रयासों से यह क्षेत्र नक्सलवाद से मुक्त हो चुका है। हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं प्रभावित गांवों में पहुंचे। उन्होंने क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा में लाने की बात कही और 225 करोड़ रुपये के विकास पैकेज की घोषणा की। जिला प्रशासन की सक्रियता से सैकड़ों बच्चों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाई गईं और कई जानें बचाई गईं। स्वास्थ्य टीमें अब उन गांवों तक जा रही हैं जहां पहले जाना मुश्किल था। पूरे 36 सालों के बाद पहली बार यह लोग अस्पताल आए हैं।

नई चुनौतियां सामने आईं
दशकों बाद जब कोई नक्सल प्रभावित क्षेत्र मुख्यधारा में आता है, तो स्वास्थ्य के साथ-साथ जागरूकता, शिक्षा, सरकारी योजनाओं की जानकारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी भी साफ दिखती है। कुछ गांव दूसरे क्षेत्रों की तुलना में कई वर्ष पीछे रह गए हैं। इसे बदलना अब सरकार के सामने बड़ी चुनौती है। इन क्षेत्रों को जल्द से जल्द सामान्य क्षेत्रों के बराबर लाना होगा। सड़क, अस्पताल, स्कूल, रोजगार, इंटरनेट, प्रशासनिक सेवाएं और सरकारी योजनाओं की पहुंच हर परिवार तक सुनिश्चित करनी होगी।

नक्सलवाद बनाम सरकार: क्या फर्क है?

नक्सलवाद क्या देता है?  
डर, बंदूक, अलगाव, सरकारी व्यवस्था से दूरी और विकास के रास्ते में बाधा।

सरकार क्या देती है?  
अस्पताल, डॉक्टर, स्कूल, सड़क, राशन, रोजगार, प्रशासन और नागरिकों को उनके अधिकारों तक पहुंच।

मान लीजिए किसी गांव में बच्चा बीमार है। नक्सल प्रभाव वाले दौर में डॉक्टर गांव तक नहीं पहुंच सकता और परिवार अस्पताल नहीं जा सकता। बीमारी जानलेवा बन जाती है। जब क्षेत्र सुरक्षित होता है, प्रशासन पहुंचता है और स्वास्थ्य व्यवस्था जुड़ती है, तो उसी बच्चे को समय पर इलाज मिल सकता है।

बंदूक किसी समस्या का समाधान नहीं करती। सड़क और अस्पताल करते हैं।

भरोसा और जागरूकता भी जरूरी है

इस समय क्षेत्र को सबसे ज्यादा जरूरत है सरकारी मदद, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, रोजगार और मुख्यधारा से दोबारा जुड़ने की। सरकार इस दिशा में काम कर रही है। लेकिन चुनौती सिर्फ विकास की नहीं, भरोसा और जागरूकता वापस बनाने की भी है।

दुर्भाग्य से ऐसे संवेदनशील इलाकों में आज भी अफवाहें फैलाने और लोगों को सरकारी व्यवस्था के खिलाफ भड़काने की कोशिशें होती हैं। ऐसे प्रयासों से वर्षों तक अलगाव झेल चुके लोगों में फिर से डर और अविश्वास पैदा हो सकता है।

जिम्मेदारी दोनों तरफ की है
सरकार की जिम्मेदारी जितनी बड़ी है, उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वहां के रहवासियों की भी है। सरकार के काम में कमी है तो सवाल पूछिए। पैकेज का हिसाब मांगिए। जहां काम नहीं हुआ, वहां आवाज उठाइए।

लेकिन अफवाहों पर भरोसा मत कीजिए। उन लोगों या संगठनों से दूरी रखिए जो आपको फिर से मुख्यधारा से दूर करने या सरकारी सुविधाओं से डराने का काम करते हैं।

मुख्यधारा में लौटना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। वहां के लोगों को भी तय करना होगा कि उनके बच्चों का भविष्य शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास में है, अलगाव और हिंसा में नहीं।

जब लोग सरकार की योजनाओं से जुड़ेंगे, अपने अधिकारों को समझेंगे और गलत सूचना से बचेंगे, तभी वे अपने अधिकारों की बेहतर रक्षा कर पाएंगे और क्षेत्र के विकास में भागीदार बन पाएंगे।

36 साल के अलगाव के बाद अब समय है उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने का। सरकार विकास का रास्ता तैयार करे और समाज उस रास्ते पर आगे बढ़े। तभी बालाघाट की यह नई शुरुआत वास्तव में स्थायी बदलाव में बदलेगी।

नक्सलवाद से नहीं, सरकार और समाज के साथ मिलकर ही इस क्षेत्र का भविष्य बदलेगा।