ADHYAPAK: परीक्षण और आश्वासन में उलझा अध्यापकों का शिक्षा विभाग में संविलियन

रमेश पाटिल। 25 जनवरी को माननीय मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ जी द्वारा राजीव भवन, छिंदवाड़ा में कर्मचारियों को जिसमें अधिकांश अध्यापक प्रतिनिधि शामिल थे को संबोधित करते हुए कहना कि मंत्रिमंडल गठन को मात्र एक माह हुआ है इसलिए हमे समय दिया जाए और हमारा ध्यान लोकसभा आचार संहिता लागू होने के पहले 53 लाख किसानों में से 35 लाख किसानों की कर्ज माफी है। जो इस बात का संकेत तो देती है कि लोकसभा चुनाव आचार संहिता के पहले अध्यापकों का शिक्षा विभाग में संविलियन की संभावना बहुत क्षीण है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वचन पत्र में दिए गए वचनों का अक्षरसः पालन किया जाएगा। मतलब स्पष्ट संकेत मिलता है अध्यापकों का शिक्षा विभाग में संविलियन का मामला लोकसभा चुनाव के बाद जाएगा। यह अध्यापको के लिए बड़ी निराशाजनक स्थिति है। 

अपने जन्म काल से ही घोषणाओं को सुनते-सुनते अध्यापक आज सेवानिवृत्ति की दहलीज पर खड़ा है, लेकिन उन घोषणाओं पर क्रियान्वयन की तत्परता किसी ने नहीं दिखाई। कड़वा घूंट पीकर अध्यापकों ने बड़े मुश्किल से कांग्रेस के वचन पत्र पर विश्वास किया था लेकिन अध्यापकों से किए गए वचनों के संबंध में कांग्रेस सरकार की तत्परता अभी तक दिखाई नहीं दी है। अध्यापको ने विगत विधान सभा चुनाव में कुछ दिग्गज कांग्रेस नेताओ से मंचो पर यह भी सुना था कि सत्ता प्राप्त होते ही कैबिनेट की पहली बैठक में अध्यापकों का शिक्षा विभाग में संविलियन कर दिया जाएगा। संविलियन तो नहीं हुआ उल्टे पिछले सरकार के निर्णयो से संबंधित आदेश धड़ाधड़ जारी हो रहे है। जिससे विपरीत परिस्थिति में माननीय श्री कमलनाथ जी के साथ खड़े अध्यापकों पर ही उल्टे दबाव बन रहा है कि हमने खुला समर्थन देकर गलती तो नही की है?

24 जनवरी को अध्यापक प्रतिनिधियों की स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव और अधिकारियों से बहुत ही सकारात्मक और उत्साहवर्धक वार्ता "शिक्षा विभाग में संविलियन" को लेकर संपन्न हुई। लेकिन इस वार्ता के पूर्व और बात की स्थिति निराशाजनक है। शिक्षा विभाग में संविलियन को लेकर पिछली सरकार का सीधा विरोध कर अध्यापक संघर्ष समिति सीधे श्री कमलनाथ जी से जुड़ी थी और उनके अनुकूल वातावरण बनाने में सहायक सिद्ध हुई थी के प्रतिनिधियों को संदेहास्पद और मजबूरी की स्थिति में इस वार्ता में शामिल किया गया ऐसा प्रतीत होता है और जो अध्यापक संघ चुनाव पूर्व श्री कमलनाथ जी से दूरी बनाए हुए थे और अपने मंच पर स्थान तक नहीं देना चाहते थे उन्हें ससम्मान आमंत्रित किया गया था। वार्ता के पश्चात भी कुछ संघ के समर्थकों ने श्रेय के चक्कर में अपनी विज्ञप्तियो में ऐसा प्रचार-प्रसार किया मानो यह वार्ता उन्हीं के संघ या नेता के कारण आयोजित थी।"समन्वय की भावना को जबरदस्त ठेस पहुंची।" 

अध्यापकों में आज चारों ओर निराशा का भाव है। शिक्षा विभाग में संविलियन के आदेश हर हाल में अध्यापक लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लगने के पूर्व चाहता है। अध्यापक प्रतिनिधियो की मांगों पर परीक्षण की बात गले नहीं उतर रही है। यदि किसानो के कर्जा माफी को पूर्ण आकलन के पश्चात वचन पत्र में रखा गया था तो यह भी माना जा सकता है कि अध्यापकों के शिक्षा विभाग में संविलियन का आकलन भी वर्तमान सरकार के नेताओ ने पूर्व में ही कर लिया होगा। तो फिर शिक्षा विभाग में संविलियन के आदेश में देरी की स्वीकार्यता नहीं बनती है।

वचन पत्र में ही अनार्थिक मुद्दों का भी समावेश था। जिसमें अध्यापकों का स्थानांतरण और पति-पत्नी का निकटस्थ स्थानों पर समायोजन का वचन भी शामिल था। इन मुद्दों को हल करने में सरकार पर कोई आर्थिक भार भी नहीं आना है। अध्यापक संवर्ग को विश्वास दिलाने के लिए यह जरूरी था कि ऑनलाइन स्थानांतरण का आवेदन कर पात्र घोषित अध्यापकों के स्थानांतरण के आदेश जारी कर दिए जाते। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बावजूद यह छोटा सा कार्य भी सरकार नहीं कर पाई। नए कैडर राज्य शिक्षा सेवा में भर्ती प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। शालाओं में रिक्त पद चयनित अभ्यर्थियों द्वारा भरे जाएंगे। जिससे रिक्त पदों का अभाव हो जाने से प्राथमिक, माध्यमिक शालाओं के अध्यापक आशंकित है कि यदि भर्ती हो गई तो कहीं हमारी ऑनलाइन स्थानांतरण की नीति ही रद्द ना हो जाए? घर वापसी की उम्मीद खत्म न हो जाए। 

हाईस्कूल, हायर सेकंडरी  शालाओं के अध्यापकों के रुके हुए स्थानांतरण के आदेश अभी जरूर हुए हैं लेकिन इसके लिए सरकार का योगदान बिल्कुल भी नहीं है। पूरा श्रेय उन अध्यापको को जाता है जिन्होंने इस विसंगति पर माननीय उच्च न्यायालय की शरण ली थी एवं विभागीय अधिकारियों की हठधर्मिता को बेनकाब किया था। सरकार अध्यापकों के प्रति गंभीर हैं तो तत्काल इसकी शुरुआत प्राथमिक, माध्यमिक शालाओं के अध्यापकों के रूके हुए स्थानांतरण जो की पूरी प्रक्रिया संपन्न कर चुके हैं और केवल आदेश का इंतजार कर रहे है से होनी चाहिए। पति-पत्नि का निकटस्थ स्थानों पर समायोजन के आदेश भी प्राथमिकता के साथ होने चाहिए। सरकार के प्रति अध्यापकों का विश्वास भी बना रहेगा और इसका लोकसभा चुनाव में लाभ भी होगा। 

न्यूटन के गति का नियम प्रत्येक क्रिया की उतनी ही समान प्रतिक्रिया होती है। यह नियम अध्यापकों पर भी लागू होता है। अंतर इतना सा भर है कि अध्यापक क्रिया पर दुगनी प्रतिक्रिया करते हैं। जिस तेजी से अध्यापक पास आया उससे दुगनी तेजी से दूर होते चला जाएगा इसमें किसी को कोई शक भी नही होना चाहिए। सोचना सरकार और अध्यापक प्रतिनिधियों के बीच मध्यस्थता कर रहे व्यक्तियों और रणनीतिकारों को है।

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