शरीर के DOCTOR को मजबूत कीजिए

मनुष्य रहा हो या न रहा हो लेकिन सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर अब तक विषाणु (वायरस) और जीवाणु (बैक्टीरिया) रहे है और सृष्टि के अंत तक निश्चित ही रहेगे। ऐसा लगता है की इस संसार पर विषाणु और जीवाणु का स्थाई साम्राज्य है। मनुष्य और मनुष्य जैसे प्राणी अस्थायी है जो आते-जाते रहते है।आज ऐसा लग रहा है जैसे पूरी दुनिया पर कोरोना वायरस ने हमला बोल दिया है।वायरस के इस अचानक हमले से मनुष्य की बौद्धिक क्षमता को कुंद कर दिया है।

इससे उभरने में समय लगेगा लेकिन मनुष्य की बौद्धिक क्षमता अनंत है।वह इस पर विजय प्राप्त कर लेगा लेकिन तब तक इसकी बहुत कीमत चुकानी होगी।कोरोना वायरस कोई अकेला वायरस नही है जिस पर विजय प्राप्त कर हम वायरस जगत पर विजय प्राप्त कर लेगे।वायरस नये-नये रूपो में हमारे सामने आयेगा और चुनौतिया देता रहेगा।इसका कारण है हमारी जीवन पद्धति, खान-पान, रहन-सहन और प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की मंशा में प्रकृति के घटको को तहस-नहस कर उनके बीच का संतुलन बिगाडना जिसको हम पर्यावरण प्रदूषण भी कहते है।

इस धरती पर मनुष्य का अभ्युदय बहुत बाद में हुआ है और शायद धरती के अंत तक वह इस धरती का हिस्सा भी नही रहेगा।मनुष्य हमेशा सुखी रहना चाहता है।सुखी रहने के दो ही प्रधान तत्व है शारीरिक और मानसिक संतुलन।दिमाग में आजकल मीडिया, धर्म के ठेकेदार, अचानक से ऐन-केन प्रकारेण सुविधा-सम्पन्न होने की चाह से जो कचरा परोसा जा रहा है जिसको हम ग्रहण भी करते जा रहे है उससे मानसिक संतुलन छिन्न-भिन्न हो गया है।अपराध, भ्रष्टाचार, धर्मान्धता, छद्म राष्ट्रवाद, आडम्बर, हिंसा, अहिष्णुता, मै की भावना जैसे मनोविकार मनुष्य के दिमाग में स्थाई घर कर चुके है।जो दुनिया को बर्बादी की ओर ले जा रहे है और हम जानते बुझते हुए भी मौन दर्शक बने हुए है।मनुष्य भी प्रकृतिकृत अद्वितीय मशीन है।जिसके देखभाल और आवश्यकताओ की जिम्मेदारी हमारी है।लेकिन हमने अपने शरीर को लापरवाह छोड दिया है।

कई नई-नई बिमारियो, संक्रमण के शिकार होते जा रहे है क्योंकि हमारी लापरवाही से शरीर का डाॅक्टर कमजोर हुआ है जिसे हम "रोग प्रतिरोधक क्षमता" भी कहते है। शरीर के लडने की क्षमता कम हो गई है।सुबह उठकर शुद्ध हवा, सूर्य प्रकाश, भरपूर नींद जो प्रकृति के निशुल्क उपहार है उसके उपयोग में हम हद दर्जे के कंजूस हो गये है। वाहनो, टीवी, मोबाईल, फ्रिज, एसी, पंखो, मिक्सर, आटाचक्की आदि वैज्ञानिक यंत्रो और सुविधाओ ने हमारी शारीरिक हलचल जो शारीरिक मशीन को चुस्त-दुरुस्त रखने में आवश्यक थी को लगभग शून्य कर दिया है।अब मनुष्य का शरीर ही उस पर बोझ बनते जा रहा है।

कहा भी गया है स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है। यदि हमे निरोगी रहना है, दीर्घायु होना है और जीवन का भरपूर आनंद लेना है तो शारीरिक-मानसिक संतुलन स्थापित करना होगा।शरीर को आलस्य के चंगुल से निकालना होगा।किसी न किसी रूप में शारीरिक हलचल करनी होगी।बौद्धिक कसौटी पर कसकर विचारो को ग्रहण करना होगा।इसके कुछ आसान तरीके भी है प्रातः भ्रमण, योग, प्रार्थना, नमाज, विपक्षणा, व्यायाम, तार्किक अध्ययन आदि।यदि इन उपायो को दैनिक जीवन में अपनाते है तो निश्चित मानिए आपके शरीर का डाॅक्टर "रोग प्रतिरोधक क्षमता" मजबूत होगी।मनुष्य अमर नही है लेकिन जीवित रहते निरोगी रहा जा सकता है और दीर्घायु हुआ जा सकता है।मानसिक रूप से स्वस्थ हुआ जा सकता है।यही तो जीवन का असली आनंद है जिसमे विश्व के प्रत्येक जन के प्रति निज परिवार के सदस्य जैसा प्रेम,आत्मियता और सहानुभूति का भाव हो।
बस इतना याद रखे "जान है तो जहान" है।- रमेश पाटिल

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