विजयाराजे सिंधियाः महारानी से राजमाता तक @ Vivek Pathak

बुंदेलखंड की माटी में शौर्य और वीरता की जो कहानियां हम सुनते हैं वो तेवर वहां जन्मी राणा परिवार की बेटी लेखा दिव्येश्वरी में भी आजीवन रहा। राणा परिवार की बेटी लेखा दिव्येश्वरी भारतीय राजनीति की प्रमुख हस्ती बनेंगी तब किसको पता था मगर सागर में जन्मी इस बेटी का वात्सल्य और दृढ़ता अब भारतीय राजनीति का इतिहास और भाजपा की धरोहर बन गया है।
 जीहां राजमाता के नाम से देश भर में ख्यात विजयाराजे सिंधिया वीर छत्रसाल की बुंदेलखंडी माटी सागर से आकर ही ग्वालियर के सिंधिया राजपरिवार की बहू बनीं थीं।

स्वाभिमानी लेखा दिव्येश्वरी से राजमाता विजयाराजे सिंधिया बनने का सफर ये कुछ दिन कुछ महीने और कुछ सालों का प्रताप न था। 
ये 21 तोपों के हकदार राजपरिवार की विचारशील बहू का उतार चड़ाव भरा सफरनामा था।
राजमाता विजयाराजे सिंधिया तब सिंधिया शासक जीवाजीराव सिंधिया की पसंद पर ग्वालियर रियासत की महारानी बनीं। वे परंपराओं का जीवन जीने वाली महारानी नहीं थीं।
विजयाराजे सिंधिया एक स्वतंत्र विचार वाली आत्मसम्मान पसंद महिला रहीं।

वे तत्कालीन शासक जीवाजीराव सिंधिया के प्रोत्साहन से राजनीति में तो आईं मगर नेहरु की कांग्रेस के तौर तरीकों से उनका कांग्रेस से अलगाव कुछ सालों में ही हो गया। 
संभवत इंदिरा इज इंडिया नारे को अपने वाली कांग्रेस और तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व के तौरतरीके उनके उसूलों के खिलाफ थी।
विजयाराजे सिंधिया ने दो आम चुनाव में कांग्रेस से सांसद रहने के बाद वैचारिक असहमति के आधार पर कांग्रेस से किनारा किया और जनसंघ को अपना विचार बनाया। वे ग्वालियर चंबल संभाग से लेकर संपूर्ण मप्र में जनसंघ और राष्ट्रवादी विचार को मजबूत करने वाली राजनेता रहीं। 
कांग्रेस के स्वर्णकाल के दौरान विजयाराजे सिंधिया का कांग्रेस से तौबा करना साफ करता है कि वे राजनीति में आत्मसम्मान से समझौता करके सत्ता को स्वीकारने योग्य नहीं मानती थीं।
 पहले वे स्वतंत्र रुप से कांग्रेस के खिलाफ चुनाव में उतरीं बाद में उन्होंने जनसंघ के दीपक को अपने राजनैतिक जीवन का उजियारा बनाया और उसके दिखाए मार्ग पर चलती रहीं। वे ग्वालियर चंबल संभाग में जनसंघ और राष्ट्रवादी विचारधारा का निरंतर संरक्षण करती रहीं। जिस दौर में कांग्रेस केन्द्र से लेकर राज्य में सत्तारुढ़ थी उस समय एक विपक्षी खेमे में खड़े होना लाभ हानि देखने वाले राजनेता की बस की बात नहीं मगर विजयाराजे सिंधिया से आम जनता में राजनेता का हृदयशील संबोधन पाने वाली राजमाता ने संघर्ष और स्वाभिमान को अपना गहना बनाया।

ग्वालियर चंबल में इंदिरा और कांग्रेस के वर्चस्व को राजमाता ने हमेशा चुनौती दी। आम चुनाव में उन्होंने कांग्रेस की सर्वोच्च नेता इंदिरा गांधी को रायबरेली में जाकर चुनौती दी हालांकि वे तब जीत न सकीं मगर इंदिरा के खिलाफ उनके चुनाव लड़ने ने राष्ट्रवादियों में भरपूर जोश भर दिया। आगे जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी तक कार्यकर्ताओं में ये उत्साह सत्ता का मार्ग प्रशस्त्र करता गया।
राजमाता विजयाराजे सिंधिया राजनीति की कुशलता में सिद्ध हस्त थीं। 
मप्र में संविद सरकार गठन में उनकी भूमिका उनकी राजनैतिक कुशलता और चातुर्य को स्पष्ट करने में काफी है।
राजमाता वात्सल्य की प्रतिमूर्ति होने के बाबजूद सिद्धांतों और स्वाभिमान के मामले मे कठोर रहीं।
अपने पुत्र माधवराव सिंधिया के कांग्रेस में जाने और उससे पूर्व आपातकाल में इंदिरा के तानाशाह रवैए ने उन्हें प्रखर कांग्रेस विरोधी बनाए रखा। वे अपने पुत्र से भी रुष्ट रहीं और इकलौते बेटे के प्रति ममता उनके राजनैतिक उसूलों और सिद्धांतों को पिघला नहीं सकी।
1980 में राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और अग्रणी राष्ट्रवादियों के साथ भारतीय जनता पार्टी रुपी पौधा भारतीय राजनीति में रोपा था।
 इस पौधे को सींचने के लिए सड़क पर संघर्ष के साथ संसाधानों की निरंतर आवश्यकता थी। सिंधिया राजपरिवार की मुखिया राजमाता ने तब राजपरिवार की थैली भारतीय जनता पार्टी को खड़ा करने खोली थी। इस वाकये को याद करते हुए उनकी बेटी  यशोधराराजे सिंधिया ने भाजपा के अंदर ही भावुक होकर कह चुकी हैं कि राजमाता ने पार्टी को खड़ा करते वक्त मेरे और बड़ी बहन वसुंधरा के गहने देने में पल भर को भी संकोच नहीं किया था। 

राजमाता विजयाराजे सिंधिया अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी जैसे संघर्ष के साथी तब भाजपा को निरंतर सींच रहे थे। 
वे अपने साथियों और सहयोगियों को अपने रक्तसंबंधियों से ज्यादा स्नेह करती रहीं।
1984 में अटल बिहारी वाजपेयी ग्वालियर से बिना राजमाता के प्रोत्साहन के चुनाव नहीं लड़े थे मगर तब राजीव गांधी की राजनैतिक कुशलता ने माधवराव सिंधिया को मैदान में उतारकर जनता के लिए धर्म संकट खड़ा कर डाला। 
राजपरिवार के प्रति ग्वालियर की जनता में आत्मीयता के चलते तब अटल जैसे राष्ट्रीय स्तर के नेता विजयी होने से वंचित रहे।
राजमाता इसके बाद भी अपने राष्ट्रवादी साथियां के साथ भाजपा को मप्र और देश भर में खड़ा करने निरंतर जुटी रहीं। इस बीच अपने इकलौते बेटे से लेकर परिवार और न जाने क्या क्या बीच में तमाम अंर्तविरोधों के बीच छूटता चला गया मगर राजमाता अपने राजनैतिक मूल्यों और सिद्धांतों पर अडिग बनी रहीं।
कांग्रेस में कार्यरत बेटे को अपनाने के लिए उन्होंने राष्ट्रवादी साथियों और कांग्रेस से अपने संघर्ष को कभी नहीं छोड़ा।
राजमाता ने कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति के समापन और हिन्दु आत्मसम्मान के लिए लालकृष्ण आडवाणी की रामजन्मभूमि रथयात्रा को भरपूर सहयोग किया। रामजन्मभूमि के लिए अयोध्या में कारसेवकों के आंदोलन का नेतृत्व करने वालों में विजयाराजे सिंधिया सबके साथ थीं। उन्हें इसके लिए मीडिया में हार्डलाइन लीडर कहा गया।
 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा ढहाए जाने के जो मामले चले थे तब उन्हें भी भाजपा के दूसरे अग्रणी नेताओं की तरह आरोपी बनाया गया। 
वे बहुत धार्मिक प्रवृत्ति की राजनेता रहीं और राम मंदिर निर्माण की आग्रहपूर्वक पक्षधर थीं।

राजनीति में आज की सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी को खड़ा करने के लिए 1980 में नींव बनने वाली राजमाता भाजपा के संस्थापकों में से एक हैं। वे भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहीं मगर अपनी बढ़ती उम्र के कारण उन्होंने संगठन और संसदीय क्षेत्र से स्व इच्छा से अपनी भूमिका का संक्षेपण किया।
राजमाता के जीवन मूल्य और राजनैतिक कुशल व्यक्तितव उनकी संतानों में भी स्वभाविक आते चले गए। आज बचपन में अपनी मां राजमाता के राष्ट्रवादी क्रियाकलापों में शामिल रहीं वसुंधराराजे सिंधिया राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री होने के बाद दूसरी दफा राजस्थान की मुखिया हैं तो सबसे छोटी बेटी यशोधराराजे सिंधिया मप्र सरकार की कबीना मंत्री हैं। राजमाता के बेटे माधवराव सिंधिया के निधन के बाद उनके पौत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया मप्र में चुनाव अभियान समिति अध्यक्ष के रुप में कांग्रेस को 15 साल से वनवास से मुक्ति दिलाने निर्णायक किला लड़ा रहे हैं।
सिंधिया परिवार में तमाम मतभेद और राजनैतिक दूरियां होने के बाबजूद गरिमामय राजनैतिक व्यवहार बना हुआ है इसे हम राजमाता विजयाराजे सिंधिया के व्यक्तित्व और आभामंडल का प्रभाव कह सकते हैं।
भारतीय जनता पार्टी देश भर में 12 अक्टूबर 2018 से राजमाता विजयाराजे सिंधिया का जन्मशताब्दी समारोह मनाने जा रही है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि राजपरिवार के अहंकार, अभिमान से कोसों दूर रहीं राजमाता से वर्तमान भाजपा ये गुण कितना सीखेगी और सीख पाएगी। 
निश्चित ही राजमाता और 1980 में शैशवकाल के अपने पालकों के प्रति मौजूदा नेतृत्व की श्रद्धा ही भविष्य के नेतृत्व के लिए भाजपा की मार्गदर्शक विरासत बनेगी।

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