महामारी से निपटने के लिए हमें चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत करना ही होगा


फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा को फ्री शिक्षा और स्वास्थ्य की गारंटी दी थी। कृति हजार जनसंख्या पर 8 चिकित्सक क्यूबा में मौजूद है। जबकि भारत में प्रति हजार के विरुद्ध मात्र पॉइंट 008 चिकित्सक मौजूद है। क्यूबा और भारत की चिकित्सकीय व्यवस्था बेहद बड़े अंतराल के साथ है। बावजूद इसके भारत में उसका अपना आयुर्वेदिक सिस्टम भी संचालित है। आजादी के बाद से आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली पर एक लंबी अवधि तक कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। जबकि इस चिकित्सा प्रणाली को संजीवनी देना इस पर रिसर्च जारी रखना सरकार का दायित्व था। ठीक उसी तरह शिक्षा व्यवस्था पर भी भारत की सोच बेहद लचर और उसके प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण महसूस नहीं किया गया है।

लेकिन कम संसाधनों और अच्छी शिक्षा प्रणाली के महंगे होने के बावजूद भारतीय युवा खासतौर पर मध्यमवर्गीय परिवारों से निकला युवा अपने संघर्ष और आत्मशक्ति के बलबूते पर वह सब हासिल कर लेता है जो क्यूबा में वहां का युवा हासिल करता है। सुधि पाठकों आज से कुछ साल पहले जब मैं वैचारिक रूप से शिक्षा और स्वास्थ्य के संबंध में विचार कर रहा था तो मैंने पाया कि वास्तव में भारत को अगर बहुत तेजी से आगे बढ़ना है तो उसे अपनी शिक्षा प्रणाली को बेहद सहज और सब्सिडाइज करना ही होगा। परंतु आरक्षण और उपेक्षा जैसी व्यवस्था के कारण शैक्षणिक व्यवस्था चरमरा गई है। इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा के कई सारी केंद्र खुले परंतु अधिकांश अब पढ़ने वालों की कमी जैसी स्थिति में है। कला साहित्य अर्थशास्त्र समाजशास्त्र साइकोलॉजी भाषा विज्ञान जैसे विषयों के प्रति भारतीय मध्यवर्ग की उपेक्षा के कारण की शिक्षा का स्तर अचानक गिरा है। 

निजी कंपनी के मैकेनिक बन कर रह जाते हैं इंजीनियर। जबकि चिकित्सकों की आवश्यकता है और आपूर्ति के मामले में शैक्षणिक व्यवस्था में ऐसा कोई सकारात्मक विचार 45 के बाद से अब तक जनसंख्या के सापेक्ष कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। अपने उक्त आर्टिकल में मैंने यह भी लिखा था कि वास्तव में संपूर्ण विकास के लिए अन्य विषयों पर ना तो सरकार का ध्यान है ना ही अभिभावकों का। परंतु सक्षम एवं उच्च स्तरीय आय समूह के बच्चे विदेशों से इन विषयों पर शिक्षा विदेशों से प्राप्त कर सकते थे और मध्यवर्ग पूर्णतः है कुकुरमुत्तों जैसे खेतों में भी बने इंजीनियरिंग महाविद्यालयों ने पढ़ाई पूर्ण करते हैं। और अब भी पढ़ाई के सापेक्ष अधिकतम 25 से 30000 प्रतिमाह का पैकेज हासिल कर पा रहे हैं। अधिकांश बच्चे साइबर लेबर की तरह काम कर रहे हैं। 

यहां सरकार ने उन विषयों पर ध्यान ही नहीं दिया जो विषय निकट भविष्य में उपयोग में आने वाले थे। कुल मिलाकर विदेशों में वह कर साइबर लेबर की तरह काम करने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर इतना कुछ हासिल नहीं कर पाए जितना कि डॉलर से भारतीय अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाया। वैसे यह एक अच्छी बात है परंतु इन साइबर लेबर के दिए अगर भारत में ही पहले बाजार उपलब्ध करा दिया जाता तो वे लेबर की तरह काम ना करके एक प्रोपराइटर की तरह काम करते। अब हम मूल प्रश्न पर आते हैं कि क्या भारत की चिकित्सा व्यवस्था फुल प्रूफ है ? तो दावे के साथ यह कहा जा सकता है कि भारत की चिकित्सा व्यवस्था फुलप्रूफ कदापि नहीं है।

अपने पुराने लिख में सरकार को हमने आगाह कर दिया था कि अगर कोई महामारी फैलती है तो उसका नुकसान अगर हम उठाएंगे तो उसका मूल कारण हमारी चिकित्सा व्यवस्था में चिकित्सकों का अभाव ही होगा।
महामारी से जो स्थिति उत्पन्न हो सकती है वह आर्थिक व्यवस्था पर गहरा संकट है। अर्थशास्त्री और विचारक मानते हैं कि पूरे विश्व भर में कोरोना वायरस से फैली महामारी विश्व की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। कोई चमत्कार ही है जो महामारी के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रख सकता है परिस्थितियां अनुकूल नजर नहीं आ रही है।

आज दिनांक 24 मार्च 2020 को भारत के प्रधानमंत्री ने संपूर्ण भारत में लॉक डाउन को 21 दिन के लिए और बढ़ा दिया है। यह निर्णय बेहद कठोर होगा परंतु बेहतर व्यवस्था और मानवता की रक्षा के लिए यह जरूरी है इसके अलावा कोई अच्छा विकल्प नजर नहीं आ रहा। इसका प्रभाव निश्चित तौर पर अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला है। लेकिन अगर यह नहीं होगा तो अर्थव्यवस्था पर जो प्रभाव पड़ेगा वह और भी भयंकर हो सकता है। विश्व की सरकारों के ऐसे निर्णय सराहनीय है क्योंकि अगर मानव शक्ति मौजूद रही तो अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है। पाठको यहां समझने की जरूरत है कि हर एक राष्ट्र को स्वास्थ्य और शिक्षा पर अधिकतम खर्च करते रहना चाहिए। 

भारत सरकार की अर्थव्यवस्था शुरू से जीवन बीमा और बचत पर केंद्रित रही इसके अपने फायदे थे लेकिन सामान्य बीमा कंपनियां विकसित राष्ट्रों में जिस तरह से सक्रियता से काम करती हैं भारत वहां बहुत पीछे नजर आता है। हर सरकार को चाहे वह किसी छोटे राष्ट्र की सरकार हो यह भारत जैसे विकासशील राष्ट्र की सरकार हो उसका कोई भी दृष्टिकोण हो उसे भविष्य के प्रावधानों खासतौर पर युद्ध महामारी और प्राकृतिक आपदा से जूझने के लिए आवश्यक प्रावधान अब कर ही लेने होंगे। खासतौर पर चिकित्सकीय व्यवस्था फुलप्रूफ होनी चाहिए। शायद विश्व के राष्ट्र इस भाषा को समझ पाएंगे।

भारत को क्या करना चाहिए? इस प्रश्न के उत्तर में केवल यह कहना चाहूंगा कि जिस तरह से भारत जैसे विकासशील देश ने तरक्की का रास्ता अपनाया है ठीक उसी तरह सामाजिक मुद्दों पर नजर डालना बहुत जरूरी है। प्रत्येक जीवन को अधिकार है कि उसे प्राकृतिक मृत्यु का अधिकार सुनिश्चित कर देना चाहिए। आपदा युद्ध और महामारी जैसी स्थितियों से जूझने के लिए सदा तैयार होना चाहिए। इसके लिए शिक्षा और स्वास्थ्य पर ना केवल अधिक खर्च करना होगा बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए समान रूप से शिक्षा के अधिकार का सृजन जरूरी है।

सरकार को उसकी अर्थव्यवस्था में सपोर्ट करने वाले मध्यमवर्ग जिसका सहयोग सकल घरेलू उद्योग एवं बचत में 60 प्रतिशत से 70% तक की भागीदारी होती है के अधिकार सुनिश्चित करने होंगे।

मित्रों- इसके अतिरिक्त आयुष्मान योजना की लाभ की परिधि में लाने के लिए 10 करोड़ से अधिक और 50 करोड़ से कम आबादी को लाना ही होगा। परंतु सरकार की माली हालत यह आंकड़ा एकदम हासिल नहीं कर सकती। उसे 50 करोड़ की आबादी को आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत शामिल करने के लिए कम से कम 5 साल की कोई कार्य योजना प्रस्तावित की जानी चाहिए और उस पर काम भी करना चाहिए। कराधान व्यवस्था को यद्यपि पिछले 10 वर्षों में काफी लाभकारी बनाया गया है किंतु इस पर और काम करने की जरूरत है।
आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली को अनदेखा करना भारत को बहुत महंगा पड़ा है। मुझे प्रतिवर्ष कफ और कोल्ड के कारण अपनी वार्षिक आय का 7% वह करना होता था। इस वर्ष मुझे सर्दियों के समय आयुर्वेदिक इलाज के जरिए यह खर्च मात्र ₹500 के भीतर करने का मौका मिला। यहां व्यक्तिगत उदाहरण इसलिए दिया गया ताकि आयुर्वेदिक प्रणाली को सरकार को स्वीकार देना चाहिए और उसमें अनुसंधान को बढ़ावा देना इलाज के लिए योग की तरह प्रोत्साहन देना जरूरी है।

सरकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे इतिहास में एलेग्जेंडर यानी सिकंदर को बचाने वाला बेहद साधारण सा वैद्य था। अर्थात हमारी प्राचीन चिकित्सा व्यवस्था को प्रोत्साहन एवं उसके संवर्धन की अत्यंत जरूरत है। यदि हम कोरोना वायरस पर समय रहते काबू ना पा सके तो मानिए कि हम स्वयं को माफ़ नहीं कर पाएंगे।
*आलेख एवं प्रस्तुति- गिरीश बिल्लोरे मुकुल*

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